बिछड़ने का वो लम्हा, क्या कहूँ,
दिल की धड़कनें भी बस, रुक गईं।
सपने अधूरे अब, आँखों में हैं,
तेरे बिना जिंदगी, जैसे ठहर गईं।
चाँदनी रातें अब, सिसकती हैं,
तेरे बिना हर सुबह ग़म की देती हैं।
हँसते थे हम, अब रोते हैं,
वक्त की धारा में, जख्म उगते हैं।
तेरे उस मुस्कान में, खोया जो एहसास था,
अब बस यादों का जश्न है, तन्हाई का यास है।
हर मोड़ पर तेरा नाम लिखा है,
फिर भी जैसे समय में, छुपा कोई ख्वाब था।
हाथों में हाथ था, अब वो हाथ नहीं,
दिल के कोने में, बस एक सन्नाटा है।
इन कागज़ों पर लिखी, बातें अब वीरान हैं,
बिछड़ने की कहानी, जैसे कोई पुरानी दास्तान है।
फिर भी, उम्मीद का दीप जलाए रखेंगे,
तू चले जाए, पर हम न हार मानेंगे।
बिछड़ने की परछाइयों में, हम सबक सीखेंगे,
कभी न भूलेंगे, पर आगे बढ़ेंगे।
-कवि लोकेश
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