बिछड़ने की रात
तारों भरी रात, चाँद का उजाला,
तेरे बिना सब कुछ, फीका सा लगता।
ख्वाबों में रंग, अब धुंधले से हैं,
तेरे हँसने से जो, दिल में बहार था।
वो सुनहरी यादें, अब दुख बन गईं,
हर मुस्कान में, तेरे चेहरे की छवि।
तू चली गई, छोड़कर यह सारा जहाँ,
मेरी दुनिया में, बस यादों की घटा।
हर लम्हा तेरा, अब एक सन्नाटा,
दिल में गुमसुम, आँखों में पानी।
खुद से बेगाना, तूने जो किया,
ये टूटता रिश्ता, सिखा गया सब कुछ।
वादा किया था, साथ निभाने का,
क्यों तूने छोड़ दिया, पलकों पे सपना?
लेकिन वक्त गुजरता है, और सहारा मिल जाता,
खुद को फिर से उठाना, यही है असली जज्बा।
तू बिछड़ गया, लेकिन सिखा गया।
खुद की पहचान, नए सफर में लगा।
अब फिर से चलूँगा, अपनी राह पर,
बिछड़ने की रात, सीखी मैंने बहुत कुछ।
-कवि लोकेश
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