विराम का पल
तेरे साथ का हर लम्हा,
अब बस एक सुनसान राह है।
खुशियों की महक से भरी,
आज ये दिल उदास है।
जिनसे थे सपने सजे,
अब वो ख्वाब हैं अधूरे।
तेरे बिना ये दिल बेकरार,
सन्नाटे में हैं सारे नज़रें।
हर याद में बसी है,
तेरी खुशबू से लिपटी,
पर जख्मों की अनगिनत रेखाएं,
बजती हैं दिल की हर एक धड़कन में।
तू जो चला गया,
सब कुछ छूट सा गया,
रिश्तों का ये अंत हमें,
अगले सफर पर ले गया।
विराम का ये पल समझा,
खुद को फिर से जीना है।
तू गया लेकिन मैं नहीं,
अब खुद से ही मिलना है।
उदासी की शामों में,
एक नई सुबह का इंतज़ार है।
जब तक मैं हूँ जीती,
तब तक मेरे सपनों का असर है।
-कवि लोकेश
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