वो रिश्ता था सजीव,
जिसे हमने किया था स्वीकार,
पर कहीं न कहीं चुकी थी गड़बड़ी,
उस रिश्ते को कर दिया हमने विचार।
दिल में था एक अजीब सी बेचैनी,
जो न किसी से हो सकी मुलाकात,
कर गए हमने वादे अनबन,
खो दिया उसका हमने साथ।
अब वो रातों को करती हैं याद,
जब हम दोनों खुश थे साथ,
पर बदल गए किस्मत के बहाने,
बिखर गए हमने चाहा जो सारा साथ।
वो रिश्ता था मजबूत एक पल,
जिसे टूटने से नहीं डरा कभी,
पर आखिरकार आ गई मन्जिल,
जिसके होने के रहे मोहब्बत को सजीव।
अब वो रिश्ते की यादें रह गईं हैं,
जो दिल में बसी हैं बेनिग्न।
पर कहीं न कहीं उसे भूलना होगा,
जिसके होने के साथ रहीं हम टूट-फूट।
-कवि लोकेश
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