विसंगति का गीत
तुम्हारे बिन ये दिल नहीं लगता,
हर सुबह एक नया आंसू बहे जाता।
खुशियों के रंग अब फीके हैं,
तेरे बिना ये जीवन अधूरा सा लगता।
बचपन की यादें, हंसी के पल,
क्यों मिट गए वे सभी सफर के कल?
सपनों में अब तेरा साया नहीं,
तीर से चुभती है, ये खामोशी का दल।
वादा किया था साथ निभाने का,
पर वक्त ने हमें जुदा कर दिया।
मेरे ख्वाबों के रंग अब धुंधले हैं,
तेरे बिना ये मेरा अस्तित्व खो गया।
फिर भी दिल को समझाना है,
सुख-दुख का ये खेल यही तो है।
चलो, नए रस्ते पर बढ़ते हैं,
जो खो गया उसे भुलाकर, आगे बढ़ते हैं।
तू यादों में बसा, पर अब छोड़ दूंगी,
जीवन के इस मोड़ पर, खुद को खोजूंगी।
धैर्य और उम्मीद से लिपटा ये दिल,
एक नए सफर की ओर, ले जाऊंगी।
-कवि लोकेश
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