हर दिन सुबह उठकर मुस्कान से,
सोचता हूँ मैं कैसे बनूं विश्वस्थ।
जो दे मुझे शक्ति, जो बनाये मुझे मजबूत,
वह है मेरा प्रेरणा स्रोत।
कभी हार ना मानूं, कभी ना थमूं मैं पथ पर,
चलता रहूं मैं उजियाले सपनों की ओर।
मेरे अंदर छुपी भावनाएं हैं अभिमानी,
जगाएं मुझमें तेज़, बनाये मुझे प्रेरित काव्यानी।
सपनों का जो किनारा है समर्पण,
उसमें एक अलौकिक शक्ति है निवास करेगी मेरे अनुगामी सपनों में अपनी दृष्टि।
हर कठिनाई में बनता हूँ मैं नया रास्ता,
प्रेरणा कि किरणों से भरा रहता है मेरा हर पल बस्ता।
मेरी प्रेरणा, मेरा जीवन का है मूलधार,
उत्साह भरे हुए मन से उम्मीद करूं फिर एक नया आरंभ।
प्रेरणा मेरी कहकर, जगाने को अपने भविष्य की आपराधिक कथा,
सफलता की नए-यात्रा में हुँकार के साथ निकलूं वहाँ देवि प्रेरणा।
-कवि लोकेश
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