Title: विराम की धूप

बिछड़ने की रुत

तेरी यादों का साया, अब किया मैंने छोड़,

दिल के तिरछे रास्ते, हैं अब वीरान बोर।

ख्वाबों में जो धुंधलाते, रंग दिन बीते,

उन सपनों की किताब को, आज मैंने सील दी।

हर लम्हा था जैसे, एक मीठा जहर,

अब वो नफरत सी लगती, ये जो था प्यार अपने पर।

फूलों की खुशबू में, जब तेरा नाम होता,

चाँद की रातों में, अब खामोशी का अंश होता।

हमने अपने दिल में, जो ख्वाब सजाए थे,

अब वो सारी बातें, बस एक हंसी में छिपाए हैं।

तू रहे जहाँ, मैं रहूँ यहाँ, करती हूँ अब मैं खुद से बातें,

दर्द को समेट कर, सीने में, लगा ली हैं नई रातें।

समय की राहों पर, चलती जाऊँगी मैं,

तेरे बिन ये जहां, अब सजाऊँगी मैं।

जो बिछड़े वो दिन, मुझे अब भुला देना,

खुश रहूँगी मैं अपने रास्ते पे, तू भी खुद को समेट लेना।

-कवि लोकेश


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Lokesh T

एक हिंदी कवि के रूप में, मैं अपने शब्दों के माध्यम से जीवन की सुंदरता, जटिलता और बारीकियों को पकड़ने का प्रयास करता हूँ। अभिव्यक्ति की इस यात्रा में मेरे साथ जुड़ें क्योंकि मैं कविता की शक्ति के माध्यम से अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को साझा करता हूँ।

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