बिछड़ने की रुत
तेरी यादों का साया, अब किया मैंने छोड़,
दिल के तिरछे रास्ते, हैं अब वीरान बोर।
ख्वाबों में जो धुंधलाते, रंग दिन बीते,
उन सपनों की किताब को, आज मैंने सील दी।
हर लम्हा था जैसे, एक मीठा जहर,
अब वो नफरत सी लगती, ये जो था प्यार अपने पर।
फूलों की खुशबू में, जब तेरा नाम होता,
चाँद की रातों में, अब खामोशी का अंश होता।
हमने अपने दिल में, जो ख्वाब सजाए थे,
अब वो सारी बातें, बस एक हंसी में छिपाए हैं।
तू रहे जहाँ, मैं रहूँ यहाँ, करती हूँ अब मैं खुद से बातें,
दर्द को समेट कर, सीने में, लगा ली हैं नई रातें।
समय की राहों पर, चलती जाऊँगी मैं,
तेरे बिन ये जहां, अब सजाऊँगी मैं।
जो बिछड़े वो दिन, मुझे अब भुला देना,
खुश रहूँगी मैं अपने रास्ते पे, तू भी खुद को समेट लेना।
-कवि लोकेश
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