बिछड़ने की रात
चाँद की चाँदनी में, दिल की बात छुपी,
तेरे संग बिताए, वो सारे पल रुकी।
हंसी के जज़्बात, अब क्यों यूं बिखरे,
तू और मैं, जैसे दो बादल बिछड़े।
तेरी यादों की खुशबू, अब तल्ख हो गई,
हर ख्वाब अधूरा है, हर खुशियाँ खो गई।
तूने जो वादे किए, वो सब झूठे निकले,
दिल के हर कोने में, बस तन्हाई की गूंज है।
तूने छोड़ा साथ, आंसू बन गए मोती,
खुद को सजीव करूँ, ये पल मेरे लिए है धीमी।
मगर दिल की गहराई में, तेरा चेहरा खोया,
बिछड़ने की ये रात, अब कहीं ठहरा सोया।
संसार की भीड़ में, एक खालीपन है,
हर कड़ी में तेरा नाम, जैसे शमशान में चिराग।
पर सुन, ये अंत नहीं है, शुरुआत तो है,
स्वयं से मिलकर, मैं फिर से खिलूँगी, ये बात तो है।
धूप निकलेगी फिर, अंधियारे का होगा अंत,
मैं चलूँगी अपने रास्ते, जहां ना हो कोई संत।
तेरे बिना भी जीना, सीखूंगी नए सपने,
बिछड़ने की इस रात में, मैं फिर से धड़कनें।
-कवि लोकेश
Discover more from Kavya Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.