बिछड़ने का ये पल है कठिन,
ख्वाबों का ताना-बाना बिखर गया।
तेरे बिना जिया है अधूरा,
हर याद में तेरे चेहरे का नूर है छिपा।
हंसते-खिलखिलाते दिन थे पहले,
अब सन्नाटे में गूंजते हैं ग़म।
दिल के कोने में तेरा नाम लिखा,
पर अब वो नाम भी है जैसे चुराना ग़म।
तन्हाई की राहों पर चलता हूँ,
तेरे बिना खुद को खोजता हूँ।
वो मीठी बातें, वो सपनों की बातें,
अब बस हैं यादों के काले कोरे पन्ने।
एक वक़्त था जब दुनिया रंगीन थी,
अब हर रंग में उदासी छाई है।
तुझे भुलाना चाहूँ, पर यादें बंधी हैं,
हर परछाई में कुछ बसी है।
खुशियों के मंजर अब तन्हा हैं,
हर खुशी में तेरा नाम है जड़ा।
लेकिन फिर भी, खुद को मैं मना रहा,
इस दिल के जख्मों को जरा सहला रहा।
डर है जो तू लौटे, या मैं न सहूँ,
पर इस बिछड़ने में भी एक सीख मिली।
चलना है आगे, खुद को संवारना है,
शायद फिर से किसी खुशी में,
नई शुरुआत का ख्वाब बुनना है।
-कवि लोकेश
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