तुम्हारे बिना जीना,
जैसे फूलों को चीना।
तेरे साथ जीने की आदत,
अब लगती है कितनी बुरी बात।
तेरी यादों का करज़ चुकता नहीं,
अब तू क्या करे, यह बता नहीं।
दिल टूटा है, ख्वाब सजने लगे थे,
तेरे बिना अब जिंदगी बेजान सी हो गई।
क्यों तोड़ दिया तू दिल इस तरह से,
सजना बिना तू अब कैसे कटेगा ये फसले।
तू छोड़कर गया मुझे तन्हा,
अब इस दर्द को कैसे जीता सहा।
संग सजने वाले अब खुद से अंजान हैं,
दिल का हर जख्म, अब जिंदगी की खान है।
तुम जाओ तुम्हें खुश रहने दो,
हम खुद अपनी क़िस्मत लिखेंगे यहा।
-कवि लोकेश
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