विराम
छोटे-छोटे सपने, अब धुंधले हैं,
तेरे बिना ये पल, रहस्य भरे हैं।
जब तू था साथ, हर गली थी रोशन,
अब तो ये साए, बस हैं उदासी की बातें।
खुशियों के छाँव में, जब तू मुस्काता,
हर आहट में तेरा नाम गुनगुनाता।
फिर क्यों आया वो दिन, तट पर तू चला गया,
सपनों की नैया, यूँ ही अधूरी रह गई।
तेरी यादों के साए, मुझे घेरे हैं,
दिल की रूपसी को, अब गहरे हैं।
हर लम्हा तेरा, एक किताब सजी,
अब वो सफ़र अधूरा, बस धुंधला सा है।
कभी खामोशी की बातें, नज़दीकियाँ होंगी,
अब तो बस अंधेरे, फिर से चुप हो उठेंगे।
तू मुझसे दूर है, पर दिल के पास है,
तेरे बिना ये मुस्कान, बस एक ढोंग है।
सिखा दिया तूने, कैसे जीते हैं हम,
पर कभी ना लौटना, ये दर्द है कम।
अब मैं उठूँगी, नए आसमान की ओर,
तू जो बिछड़ा है, वो तो है एक साज़।
चलो, अब विराम लें, एक नई कहानी लिखें,
खुद को फिर से खोजें, और नई राहें चुनें।
तेरे बिना भी, मैं चलूंगी आगे बेशक,
हर मोड़ पर, तेरा नाम लिए, पर अब आज़ाद।
-कवि लोकेश
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