विराम
तुमसे शुरू हुई थी एक नई कहानी,
हर लम्हा बस तेरा, मेरा दीवाना।
ख्वाबों की जाल में बुनते थे रिश्ते,
पर वक्त ने लिख दी एक अनजानी कहानी।
दिल में था प्यार, आँखों में था सपना,
फिर क्यूँ आया ये ख़ामोश सन्नाटा।
जिन पलों को जी लिया हमने साथ में,
अब वो पल हैं बस यादों की बातें।
फूलों सी खुशबू, अब कांटों की तरह,
हंसते थे कभी, आज हैं आंसुओं की डगर।
तुमसे छूटी हैं राहें, खो गए हैं रास्ते,
फिर भी दिल में बसी है तेरी सूरत जैसे।
विराम की यह घड़ी, एक पल का है किसा,
जुदाई की चिंगारी, अब बन गई है दंपति।
लेकिन मैं सीखूंगा, संभालना खुद को,
हर दर्द में छिपा है, नया सफर, नया मोड़।
चलूँगा मैं आगे, ना पीछे मुड़ूँगा,
तेरे बिना भी जी लूँगा, खुद को सजा लूँगा।
इस दर्द की परछाई में चमकेगा नया सवेरा,
विराम है बस एक, ज़िंदगी का सफ़र है पूरा।
-कवि लोकेश
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