बिछड़े लम्हे, यादों की ख़ामोशी,
दिल के कोने में छुपी है एक कहानी,
ख्वाबों की दुनिया, अब वीरान है,
तेरे बिना, सब कुछ अधूरा, सुनसान है।
जब पहली बार मिले थे, खिल उठी थी धड़कन,
तेरे साथ में जैसे थमी थी हर एक पल,
अब तो हर सुबह की किरण भी करे बग़ावत,
तेरे बिन, ये आलम लगे है जैसे कोई जलजला।
तेरी हंसी में थी मेरी ज़िंदगी की रोशनी,
तेरे बिना हर रात, अब है बस सिसकियां,
तेरे नाम के सारे अल्फाज़ हैं जुदा,
जज़्बातों की नदी में, खो गई मेरी कश्ती।
फिर भी मैं सीधा चलूं, ये संकल्प मेरा है,
टूटे सपनों के साथ, फिर से जीने की चाहत है,
दिल के दर्द को समझूँ, मुस्कुराहट से ढक दूं,
जुदाई की इस राह पर, अपने को फिर से पहचान लूं।
बिछड़े लम्हे की छाया में, वक्त की धुंधलेपन,
आगे बढ़ूंगा, नई सुबह की तलाश में,
तेरा नाम लूँगा, लेकिन अब बस एक अदरक,
इस बिछड़ने के सफ़र में, ढूँढूंगा खुद को फिर से।
-कवि लोकेश
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