बिछड़ने की रात
तेरे बिना ये रात कितनी गहरी है,
सन्नाटे में बस तेरी यादों की फेरी है।
चाँद भी छुप गया, सितारे भी उदास,
दिल के कोने में अब बस तन्हाई की आवाज।
ख्वाबों में थी तू, अब सपना अधूरा है,
हंसते थे हम कभी, अब आँखों में नूरा है।
हर लम्हा बिखर गया, जैसे पतझड़ की बात,
वो प्यार भरी हंसी, अब है बस एक याद।
चलते थे जब हम, संग-संग हाथों में हाथ,
अब वो राहें भी हैं वीरान, खाली है सौगात।
जाने क्यों तेरा नाम लबों पर आता है,
हर मोड़ पर तेरा इश्क, रुलाता है।
दिल में तेरे लिए एक कोना बचा है,
यादों का वो शहर, अब बहुत ही बड़ा है।
लेकिन मैं मजबूर, वक्त को रोक नहीं सकता,
बिछड़ने की इस रात को, मैं भूला नहीं सकता।
फिर मिलेंगे कभी, इस आस में जी लूँ,
तेरे बिना भी जीने की, एक नई रीत खोज लूँ।
लेकिन आज फिर से, तन्हाई की रात है,
बिछड़ने की इस कहानी में, मेरी यादों की मात है।
-कवि लोकेश
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